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अमरकोश की देवश और इसकी समस्याओं की उपप्रकृता है।

इस में 2 न विद्वानों में रचनात्मक (relevance to the present day problems and needs of society and the country)

प्राच्य विद्यार्थी निर्माण सम्मुख था। हिन्दी में मौलिक रचना की भारी अनिवार्यता है। इससे प्राच्य में ग्रन्थ के अभीत की पूर्ति होगी।

क्षमता बढ़ेगी तथा हिन्दी भाषियों के लिए मौलिक शब्दकोश सर्व पूर्वाग्रह रहित है। इसकी रचना के पीछे कोई पैसा उद्देश्य नहीं है। प्राच्य एवं पश्चिमी विद्वानों के शब्दकोश निर्माण में रचना ही उसका उद्देश्य है। लेकिन ऐस का निर्माण ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालयों के प्रतिष्ठित प्रोफेसर के रूप में की गई थी। जैसा कि मोनियर विलियम ने अपने शब्दकोश के निर्माण के पीछे नहीं है। ग्रन्थ के दो भागों में से एक प्रथम भाग में लिखा है कि "कह सकते हैं कि वेद ऐतिहासिक होने पर भी इतिहास की पहुँच से बहुत पार है। उसने कहा है कि 'ऐतिहासिक वेदार्थ प्रक्रिया के साथ-साथ अन्य प्रकार की अनैतिहासिक एवं परोक्षदर्शी वेदार्थ प्रणाली पर ध्यान देना न केवल वांछनीय है अपितु वेद के सर्वांगीण अनुशीलन के लिए आवश्यक भी है।'

वेद के असीम कलेवर को किसने देखा है? उसके परम आत्मा को किसने परखा है। वेद अनन्त है, एक अकेला ही सहस्रवर्तमान है। वेद का आविष्ट मुख्य पक्षों में इहलोक एवं परलोक दोनों के समग्र तत्वों का है। वैदिक तत्व असीम है, अनादि एवं अनन्त है। वेद भी अनादि है, वह अनन्त, असीम और अपौरुषेय है। फिर उसकी झांकी थी वेद की हमारे सम्मुख जब हमने रूप ग्रहण करने हमारा सम्मुख उभरा।

श्री पूर्वकान्त ने ऊपर चर्चित जिन विचारों से प्रेरित होकर वेद की ओर दृष्टि डाली तो उससे उसकी व्याख्याओं में वैज्ञानिक होने में सफल हुआ।


The above text discusses the relevance of Amarkosha and its problems. It mentions the need for original works in Hindi by Oriental scholars, the importance of unbiased dictionaries, and references to Oxford professors like Monier Williams. It then delves into philosophical discussions about the Vedas, describing them as eternal, infinite, and beyond historical reach. The text concludes with a mention of Shri Purvakant's scientific approach to Vedic interpretations.
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